Jai Guru Ji
गुरुजी, एक दिव्य प्रकाश, 7 जुलाई 1954 को पंजाब के मलेरकोटला जिले के डूगरी गाँव में जन्मे. उन्होंने अपना प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा वहीं पूरी की. बचपन से ही उनमें आध्यात्मिकता की झलक थी, जो बाद में लोगों के दुःख दूर करने के लिए एक आशीर्वाद बन गई. जालंधर, चंडीगढ़, पंचकूला और नई दिल्ली जैसे विभिन्न स्थानों पर उनके सत्संगों में दूर-दूर से लोग आते थे.
गुरुजी के आशीर्वाद से लोगों के असाध्य रोग दूर हुए, समस्याएं हल हुईं और कुछ को दिव्य दर्शन भी हुए. उनके दरवाजे सभी के लिए खुले थे, चाहे वो किसी भी वर्ग, धर्म या सम्प्रदाय के हों. राजनेता, व्यवसायी, नौकरशाह, सैन्यकर्मी, डॉक्टर सभी उनका आशीर्वाद लेने आते थे. गुरुजी ने कभी किसी से कुछ नहीं लिया और न ही लेने की उम्मीद रखी. उनका आशीर्वाद भक्त के साथ उसके निर्वाण तक रहता था.
गुरुजी ने कभी उपदेश नहीं दिया, न ही कोई रस्म निर्धारित की, फिर भी उनका संदेश भक्त तक पहुँच जाता था. उनके चारों ओर दिव्य सुगंध रहती थी, जो आज भी भक्तों को उनकी उपस्थिति का एहसास दिलाती है. 31 मई 2007 को उन्होंने महा समाधि ली और कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा. उनका मानना था कि भक्त को सीधे उनसे जुड़ना चाहिए. उनका मंदिर दक्षिण दिल्ली में भाटी माईन्स के पास है. आज भी उनका आशीर्वाद उतना ही प्रभावी और शक्तिशाली है, यहां तक कि उन लोगों पर भी जो उनसे कभी नहीं मिले.
गुरुजी के आशीर्वाद से लोगों के असाध्य रोग दूर हुए, समस्याएं हल हुईं और कुछ को दिव्य दर्शन भी हुए. उनके दरवाजे सभी के लिए खुले थे, चाहे वो किसी भी वर्ग, धर्म या सम्प्रदाय के हों. राजनेता, व्यवसायी, नौकरशाह, सैन्यकर्मी, डॉक्टर सभी उनका आशीर्वाद लेने आते थे. गुरुजी ने कभी किसी से कुछ नहीं लिया और न ही लेने की उम्मीद रखी. उनका आशीर्वाद भक्त के साथ उसके निर्वाण तक रहता था.
गुरुजी ने कभी उपदेश नहीं दिया, न ही कोई रस्म निर्धारित की, फिर भी उनका संदेश भक्त तक पहुँच जाता था. उनके चारों ओर दिव्य सुगंध रहती थी, जो आज भी भक्तों को उनकी उपस्थिति का एहसास दिलाती है. 31 मई 2007 को उन्होंने महा समाधि ली और कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा. उनका मानना था कि भक्त को सीधे उनसे जुड़ना चाहिए. उनका मंदिर दक्षिण दिल्ली में भाटी माईन्स के पास है. आज भी उनका आशीर्वाद उतना ही प्रभावी और शक्तिशाली है, यहां तक कि उन लोगों पर भी जो उनसे कभी नहीं मिले.